हिंदी गझल

by प्रशेन ह क्यावल

खेल ये है अपनी पसंद का March 8, 2008

खेल ये है अपनी पसंद का, खेलतें ही जाएंगे।
चाहें धोका लाख खाए, प्यार लुटाते जाएंगे।

भुल अपनी भुलने को, है अक्सीर ये इलाज,
चिज कितनी भी बुरी हो, युँही पीते जाएंगे।

गम का दुसरा नाम ही, ये जिंदगी है प्यारे,
कर ले तु कितने सितमभी, हम तो जीते जाएंगे।

कोई नहीं है आसपास, पुछने मातम का सिला,
आप आए ना आए, हम तो रोतें जाएंगे।

खोकलें इन लफ़्जोंके खातिर, सबकुछ लुटाया जिंदगी में,
अब है आदत से ‘परेशां’, युँही लिखतें जाएंगे।

—- © Prashen H Kyawal,
http://hindigazal.wordpress.com

 

सुबह से शाम तक March 8, 2008

सुबह से शाम तक गुनगुनाता रहुगा।
मै तेरे प्यार के गीत गाता रहुगा।

दुनिया ये चाहें रहे ना रहेगी,
मैं तुझें सदा याद करता रहुगा।

परवानें जलें ना जलें, शमां के वास्तें,
मैं तेरी नुरेंनजर पे जलतां रहूगा।

मुझे नही पर्वा, मिलने-बिछडनें की,
मेरी चाह के मैं तुझें प्यार करतां रहुगा।

—- © Prashen H Kyawal,
http://hindigazal.wordpress.com

 

क्या बताऊं? March 8, 2008

क्या बताऊं यार के, कयामत मेरे साथ हुई।
एकबार मुस्कुराकर वो मेरे मौत का सामान कर गई।

वो मुझे देखकर भी अंगडाई ले गई,
क्या उन्हे खबर, क्या सितम कर गई।

शुक्र है के वो बाहर, नाकाबपोश आई,
वैसे ही देख के उसे, आधी जान निकल गई।

ऊंगली जो रात सपनेंमें, उनकी दिख आई,
गुजर गयी थी उमर, जब मुझेमें जान आई।

पहनकें लाल जोडा, वो जो डोली सवार गई,
शम्शान के रास्ते अर्थींयो की, कतार लग गई।

—- © Prashen H Kyawal,
http://hindigazal.wordpress.com

 

मांगा तो नही था March 8, 2008

देख के हमें क्यूं, मूंह फेर लिया सितमगर,
तेरी मुस्कान के अलावा कुछ और, मांगा तो नही था।

देख के उखड जातें हो साकी, मेरा चेहरा मैखानेंपर,
इक जाम के के अलावा कुछ और, मांगा तो नही था।

ऎ खुदा ठुकराने की, इतनी भी जल्दीं क्या थी?
मैनें गम के अलावा कुछ और, मांगा तो नही था।

यकायक वो बरस गए, अनचाही बारिश की तरह,
ऎसेही कत्ल के अलावा कुछ और, मांगा तो नही था।

शुक्रियां जो कुचल गए, गुलेदिल को हमारे,
तेरी छुवन के अलावा कुछ और, मांगा तो नही था।

क्युं लिख दी इतनी जिंदगी, हाथ में उनके बैगर,
मैने इक मौत के अलावा कुछ और, मांगा तो नही था।

—- © Prashen H Kyawal,
http://hindigazal.wordpress.com

 

क्या यहा अपना है? March 8, 2008

ना जमीं अपनी है, ना फलक अपना है।
बस इक मौत के सिवा, क्या यहां अपना है॥

आस थी दिल को के वो बनेंगे अपने
उनके जाने के बाद, क्या यहां अपना है।

काफ़िला चलता है, तेरे जाने के बाद भी
फिर कोहरा क्युं ये है, क्या यहां अपना है।

याद कर के तू यहा, आया था खाली हाथ
इक चाक-ए-कफ़न के सिवा, क्या यहां अपना है।

भेजा उसने, इनायत थी, ले जाएगा वहीं
उसके नाम के अलावा, क्या यहां अपना है।

सोचते थे वो के हमें बुलाए या न बुलाए
उनके बुलावे के बाद, क्या यहां अपना है।

हर एक घर से ठोकरें खाकें निकलें,
अब इनकें अलावा, क्या यहां अपना है।

नाज था बहूत अपनी तारिफ-ए-शायरी पर,
इजहार उनका, बातें उनकी, क्या यहां अपना है।

—- © Prashen H Kyawal,
http://hindigazal.wordpress.com

 

तंग आ गये है जिंदगी से March 8, 2008

तंग आ गये है जिंदगी से, अब मौत चाहीए।
इस जल-जल के मरने का, कोई अंत चाहीए।

खैरातें बाटीं है कई, खुदा के डर से हमने,
हकसे छिननेवाला कोई, गुस्ताख चाहीए।

वैसे तो किये है हमनें, बेपर्दा कई चेहरें,
इक दिल तो अब कोई, बेदाग चाहीए।
मिले कई रकीब इस मैखाने जहां में,
राजेंदिल बताने कोई, राजदार चाहीए।

होती नहीं है पुरी चाहतें, देखा है अक्सर,
बेचाह बेजान सी कोई, और जिंदगी चाहीए।

सौ साल तो बस उन्हे, देखनें में निकल गए,
इजहारेमुहब्बत के लिए लंबीसी, कोई उम्र चाहीए।

मिले है कई हौसला देनेवाले, तुफा-ए-जिंदगी में,
साथ देनेवाला कोई, हमराज चाहीए।

रहतें है हम हरदम, झगमगाती दुनियां में,
मुंह छुपाने को किसी, आंचल का अंधेरा चाहीए।

—- © Prashen H Kyawal,
http://hindigazal.wordpress.com

 

वो March 8, 2008

क्या पता वो क्युं, चुपचुप से रहते हैं, डरतें है
के हँसते ही कही मोती ना बिखर जाए।

उनकी आंखों में कोई, खोई किताब है मेरी,
पढतें तो आती है मगर, जहन मे नही आए।

बातें करते है रकीबोंसे, हँसहँसकर जनाब,
मेरी नापसंदही उनको, क्युं पसंद आए।

आँखे है उनकी गहरी, सागरसी नीली नीली,
और अब्र ऐसे के, सागरपर है अब्र छाए।

करतें ही नहीं लबों से, एक बात भी कभी,
इक नजर देंख के ही, सारा फ़साना कह जाए।

प्यारे है हम उनको, सो हमसें दूर रह्ते है,
छुते ही उनको कहीं हमारी, जान ना चली जाए।

पता है के वो नहीं खुबसुरत जहाँ मे सबसे,
फिर भी देखे बिना उनकों, हाये रहा नही जाए।

सुनके मातम मौतपर मेरी, उनका मेरे जनाजें में,
मेरी आई मौत भी, सहम कर रुक जाए।

—- © Prashen H Kyawal,
http://hindigazal.wordpress.com

 

हे नारी! March 8, 2008

हे नारी, तू शक्ती है, तू भक्ती है
तू ममता की, साक्षात मूर्ती है।

तुझसे निपजता सारा जीवन,
तूझमें विहरता सारा यौवन,
तू व्रूध्दों के लिए सेवा है,
तू हर सुखों की कर्ती है।
हे नारी….
 
तू प्रक्रूती की परिभाषा,
तू निसर्ग की परछाई,
तू भजन का भक्तीभाव है,
तू रणभूमी की स्फुर्ती है।
हे नारी….

तू है छाया, तू है धूप,
तू चंडी का रौद्र्रुप,
थर्राती तुझसे धरती है,
दिगदिगांत में तेरी किर्ती है।
हे नारी….

तू सिता के मन में समाई,
तू राधा के तन में समाई,
साधूसंत जिसे स्वर्ग कहतें है,
तू धरती पर वही मुक्ती है।
हे नारी….

—- © Prashen H Kyawal,
http://hindigazal.wordpress.com

 

हँस के क्या देखा उन्होने February 24, 2008

हँस के क्या देखा उन्होने, के निशाने बन गए।
बात तो बस छेडी ही थी, और अफ़साने बन गए।

कहते थे दुसरोंको, मुहब्बत में क्या रखा है,
पीया जो एक प्याला, घरपे मैखाने बन गए।

वैसे तो वो हरदम नजर के सामने रहते थे,
अचानक ये क्या हुआ, उनके दिवाने बन गए।

खुदा करे हम अक्सर युँही बिमार रहा करे,
वैसे ही उनके आने के, वो बहाने बन जाए।

बाँहें फैलाए खडे ये नदी, हमआगोश करने के लिए,
उनका सागर कोई ऒर था, हम किनारे बन गए।

आते नही है लिखते कागज पे काले अक्षर,
तेरे गित गाते-गाते, हम भी शायर बन गए।

— © प्रशेन ह कयावल
http://hindigazal.wordpress.com