हिंदी गझल

by प्रशेन ह क्यावल

तंग आ गये है जिंदगी से March 8, 2008

तंग आ गये है जिंदगी से, अब मौत चाहीए।
इस जल-जल के मरने का, कोई अंत चाहीए।

खैरातें बाटीं है कई, खुदा के डर से हमने,
हकसे छिननेवाला कोई, गुस्ताख चाहीए।

वैसे तो किये है हमनें, बेपर्दा कई चेहरें,
इक दिल तो अब कोई, बेदाग चाहीए।
मिले कई रकीब इस मैखाने जहां में,
राजेंदिल बताने कोई, राजदार चाहीए।

होती नहीं है पुरी चाहतें, देखा है अक्सर,
बेचाह बेजान सी कोई, और जिंदगी चाहीए।

सौ साल तो बस उन्हे, देखनें में निकल गए,
इजहारेमुहब्बत के लिए लंबीसी, कोई उम्र चाहीए।

मिले है कई हौसला देनेवाले, तुफा-ए-जिंदगी में,
साथ देनेवाला कोई, हमराज चाहीए।

रहतें है हम हरदम, झगमगाती दुनियां में,
मुंह छुपाने को किसी, आंचल का अंधेरा चाहीए।

—- © Prashen H Kyawal,
http://hindigazal.wordpress.com

 

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