खेल ये है अपनी पसंद का March 8, 2008
खेल ये है अपनी पसंद का, खेलतें ही जाएंगे।
चाहें धोका लाख खाए, प्यार लुटाते जाएंगे।
भुल अपनी भुलने को, है अक्सीर ये इलाज,
चिज कितनी भी बुरी हो, युँही पीते जाएंगे।
गम का दुसरा नाम ही, ये जिंदगी है प्यारे,
कर ले तु कितने सितमभी, हम तो जीते जाएंगे।
कोई नहीं है आसपास, पुछने मातम का सिला,
आप आए ना आए, हम तो रोतें जाएंगे।
खोकलें इन लफ़्जोंके खातिर, सबकुछ लुटाया जिंदगी में,
अब है आदत से ‘परेशां’, युँही लिखतें जाएंगे।
—- © Prashen H Kyawal,
http://hindigazal.wordpress.com
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