हिंदी गझल

by प्रशेन ह क्यावल

वो March 8, 2008

क्या पता वो क्युं, चुपचुप से रहते हैं, डरतें है
के हँसते ही कही मोती ना बिखर जाए।

उनकी आंखों में कोई, खोई किताब है मेरी,
पढतें तो आती है मगर, जहन मे नही आए।

बातें करते है रकीबोंसे, हँसहँसकर जनाब,
मेरी नापसंदही उनको, क्युं पसंद आए।

आँखे है उनकी गहरी, सागरसी नीली नीली,
और अब्र ऐसे के, सागरपर है अब्र छाए।

करतें ही नहीं लबों से, एक बात भी कभी,
इक नजर देंख के ही, सारा फ़साना कह जाए।

प्यारे है हम उनको, सो हमसें दूर रह्ते है,
छुते ही उनको कहीं हमारी, जान ना चली जाए।

पता है के वो नहीं खुबसुरत जहाँ मे सबसे,
फिर भी देखे बिना उनकों, हाये रहा नही जाए।

सुनके मातम मौतपर मेरी, उनका मेरे जनाजें में,
मेरी आई मौत भी, सहम कर रुक जाए।

—- © Prashen H Kyawal,
http://hindigazal.wordpress.com

 

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